जसराजपुर। बौद्ध परंपरा के अनुसार वर्षाकाल (वर्षावास) के दौरान बौद्ध भिक्षुओं के लिए भ्रमण करना वर्जित माना गया है। भगवान गौतम बुद्ध ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई थी ताकि वर्षा ऋतु में यात्रा के दौरान होने वाली कठिनाइयों से बचते हुए भिक्षु एक ही स्थान पर रहकर धर्म का अध्ययन, ध्यान-साधना एवं अभ्यास कर सकें। इस अवधि में भिक्षु प्रतिदिन केवल एक बार ही भोजन ग्रहण करते हैं। आज भी विश्वभर में बौद्ध भिक्षु वर्षावास के चार महीनों में अपने विहार में निवास करते हुए साधना और धर्म अध्ययन करते हैं, जबकि उपासक उनके पास पहुंचकर भोजन अर्पित करते हैं तथा धर्मोपदेश का लाभ प्राप्त करते हैं।

वर्षावास कर रहे बौद्ध भिक्षुओं का दल सोमवार को ग्राम जसराजपुर पहुंचा, जहां उन्होंने परंपरागत रूप से भिक्षाटन किया। ग्रामीणों ने श्रद्धा एवं सम्मान के साथ उनका स्वागत किया और अपने-अपने घरों में आमंत्रित कर भोजन कराया तथा श्रद्धानुसार दान-दक्षिणा भी अर्पित की।

भिक्षु भोजन ग्रहण करने के पश्चात अपने विहार लौटे, जहां सभी ने सामूहिक रूप से भोजन किया। इसके बाद ग्रामीणों को धर्मदेशना देते हुए भिक्षुओं ने कहा कि वर्षाकाल में भिक्षुओं को भोजन कराना अत्यंत पुण्य का कार्य है। उपासकों द्वारा अपनी मेहनत की कमाई से अर्पित किया गया अन्न भिक्षुओं को साधना और धर्म प्रचार के लिए शक्ति प्रदान करता है। उसी शक्ति के माध्यम से भिक्षु समाज में ज्ञान का प्रसार करते हैं और उस पुण्य का फल भोजन कराने वाले उपासकों को भी प्राप्त होता है।

धर्मदेशना के दौरान भिक्षुओं ने कहा कि लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व जब भगवान तथागत गौतम बुद्ध इस क्षेत्र में आए थे, तब उन्होंने भी संभवतः जसराजपुर गांव में इसी प्रकार भिक्षाटन किया होगा। इसलिए यह गांव अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व का है तथा यहां के लोगों में आज भी बौद्ध परंपरा और भिक्षुओं के प्रति गहरी श्रद्धा विद्यमान है।

इस अवसर पर गांव के वरिष्ठ नागरिक रोशन लाल यादव, दीप सिंह जाटव, सुरेंद्र सिंह वाल्मीकि, रामवीर सिंह, ईरान सिंह कठेरिया, संजना श्रीवास्तव, महेश चंद्र, शिवम कुमार सहित अनेक ग्रामीणों ने भिक्षुओं का ग्राम प्रवेश पर भव्य स्वागत किया तथा श्रद्धापूर्वक भोजन एवं दान अर्पित किया।

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